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May 24, 2024

इन ऊँची पोस्ट पर महिलाओं का दिखना मुश्किल

8 Mar. Vadodara: 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के तौर पर मनाया जाता है। लेकिन क्या महिला सशक्तिकरण केवल एक दिन तक सिमित है। आपको इंटरनेशनल विमेंस डे के मौके पर प्रस्तुत करते हैं एक लेख।

बात 1975 की है। UN यानी यूनाइटेड नेशंस ने इंटरनेशनल विमेंस ईयर मनाते हुए पहली बार इंटरनेशनल विमेंस डे यानी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को भी मनाया था। 2 साल बाद 1977 में यूएन जनरल असेंबली ने सभी सदस्य देशों को बुलाकर 8 मार्च को महिला अधिकार और विश्व शांति के लिए यूएन डे घोषित कर दिया।

उसके बाद से यह 45वीं बार है, जब पूरी दुनिया विमेंस डे मना रही है, लेकिन आज भी एक बड़ा सवाल जो हर किसी के ज़हन में किसी न किसी तौर पर रहता है- आखिर साल में एक दिन विमेंस डे मना लेने भर से कुछ बदला भी है या यह सिर्फ रस्म ही अदा की गयी है। आंकड़े तो यही कहते हैं कि दुनियाभर में बदलाव जिस तेजी से होने चाहिए थे, वैसे हुए नहीं। भारत में तो महिलाओं के हालात और भी हैरान-परेशान कर देने वाले हैं।

तमाम सरकारी और सामाजिक कोशिशों के बाद देश में पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन इस पढ़ाई को उसी दर से करियर में बदलना महिलाओं के लिए अब भी बहुत दूर की बात है। जमीनी सच का अंदाज इस एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि, बोर्ड एग्जाम में टॉप करने वाली लड़कियों में 40% को विदेश जाकर पढ़ने का मौका मिलता है। जबकि लड़कों में यह दर 63% है।

आजादी के 73 साल बाद भी नौकरशाही हो या ज्युडिशरी, महिलाओं की नाममात्र मौजूदगी है। कुछ ऐसा ही हाल देश का सर्वोच्च भारत रत्न जैसे सम्मान और फिल्म फेयर जैसे बेहद मशहूर अवॉर्ड का है। इनमें भी महिलाओं के नाम नाममात्र ही दिखाई देता है।

आज भी टॉपर लड़कियों का विदेश में तालीम हासिल करना एक सपना बनकर रह गया है। इसके आंकड़े यदि हम आपको बताएं तो एक वक्त के लिए आप भी अचंभे में पड़ जाएंगे। यह आंकड़ा केवल 40 फ़ीसदी का है, जिसमें 63 फ़ीसदी पुरुष शामिल है। 1996 से 2016 के बीच नेशनल बोर्ड में टॉप करने वालों का आंकड़ा है जिसमें 40 फ़ीसदी महिलाएं अपनी आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए विदेश जाना मुश्किल साबित होता है।

बोर्ड में टॉप करने वाली 5 में से केवल एक महिला पीएचडी करने में सक्षम होती है। पीएचडी करने वालों 20 फ़ीसदी महिलाएं होती हैं तो 34 फीसदी पुरुष होते हैं। पीजी करने वाले टॉपर्स में 43% महिलाएं हैं और 45% पुरुष हैं। यह आंकड़ा 1996 से लेकर 2016 तक का है।

भारत में महिलाओं की तनख्वाह पुरुषों से 19% कम दी जाती है। पुरुषों की हर घंटे की औसत तनख्वाह 242.49 रूपए हैं। जबकि उसी काम के लिए महिलाओं को प्रति घंटे की औसत तनख्वाह 196.3 रूपए है। महिला और पुरुष की प्रति घंटे हॉस्टल सैलरी में 46.19 रूपए का अंतर देखा जाता है।

सबसे ज्यादा तनख्वाह पाने वाले पुरुष सीईओ अशोक लेलैंड के विनोद के दसारी हैं। 2019 में विनोद के दसारी को 131.23 करोड़ रुपए सालाना सैलरी मिली। वही सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाली महिला सी ओ आर टी कृष्णा हैं। 2019 में आरती कृष्ना को 18.32 करोड़ रूपए सालाना सैलरी मिली।

पब्लिक डोमेन की बात करें तो सुप्रीम कोर्ट के 30 चर्च में से केवल 2 महिला जज हैं। अब तक सुप्रीम कोर्ट में केवल 7 महिला जज चुनी गईं। देश के 26 हाईकोर्ट में कुल 1079 जज में से 82 महिला जज हैं। 26 हाईकोर्ट में केवल एक महिला चीफ जस्टिस है। जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट में गीता मित्तल देश की इकलौती महिला चीफ जस्टिस है। वहीं लोकसभा में केवल 14 फ़ीसदी महिला सांसद है। जबकि राज्यसभा में सिर्फ 11% महिला सांसद हैं।

अब तक केवल 5 महिलाओं को ही मिला है भारत रत्न

1954 से रोहतक 48 लोगों को मिला है भारत रत्न। 1971 में भारत रत्न पाने वाली पहली महिला थी इंदिरा गांधी। भारत रत्न पाने में इन महिलाओं का नाम शामिल है: इंदिरा गांधी, मदर टेरेसा, अरुणा आसफ अली, एमएस सुब्बुलक्ष्मी और लता मंगेशकर। वहीं एंटरटेनिंग दुनिया की बात करें तो केवल 4 महिलाओं को बेस्ट डायरेक्टर का फिल्मफेयर हासिल हुआ है।