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चुनावी चहल पहल: “मेरी मर्जी मेरा वोट” NOTA

“मेरा वोट मेरी मर्जी” अंतर्गत ईवीएम में निहित NOTA के बटन का उपयोग चुनाव में लोग करने लगे है, और प्रत्याशी को नोटा के जरिए हटाने के भी उदाहरण है। आज चुनावी चहल पहल में बात करते है, NOTA की अहमियत की।

चुनाव में चुनाव के दौरान लोगों की प्रत्याशियों,और पार्टियों के प्रति उदासीनता, नाराजगी के मद्दे नजर सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2013 के सितंबर माह में चुनाव आयोग को सूचना दी कि ईवीएम मशीन में ऐसी व्यवस्था की जाए ताकि जो लोग यदि प्रत्याशी या पार्टी को योग्य नही समझते, और वोट नहीं देना चाहते, तो वे इसका उपयोग कर सके,और मतदाता के रूप में मौजूद भी रहे। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद वर्ष 2014 से ईवीएम मशीन में सबसे आखिर में नोटा का बटन जोड़ा गया।नोटा यानि none of the above .और तब से जागृत नागरिक इसका उपयोग करता आ रहा है। इस व्यवस्था से पहले जो लोग वोट देने के इच्छुक नहीं होते थे, उनके लिए फॉर्म 49_0 भरने का विकल्प था।

पिछले पांच सालों में 1.29 करोड लोगों ने नोटा के प्रावधान का उपयोग किया है। वर्ष 2014 में 1.08 प्रतिशत लोगों ने नोटा का बटन दबाया। पिछले चुनाव में 65 लाख लोगों ने नोटा का बटन दबाकर अपनी नाराजगी जताई। डाक मतपत्र से 22.272 वोट नोटा में पड़े। 2019 में 1.06% मत नोटा में गए, जबकि कुल मतदान उस वर्ष 67.11% हुआ था। असम और बिहार में 2.08 प्रतिशत, सिक्किम में 0. 65%,(सबसे कम)और सबसे अधिक गोपालगंज में 5.03% मतदान नोटा में हुआ था।

वर्ष 2017 में गुजरात की विधानसभा चुनाव के वक्त 30 सीटों पर नोटा ने खेल बिगाड़ा था। 30 सीटों के लिए भाजपा और 12 सीटों पर कांग्रेस की जीत हुई थी। इन्हें छोड़कर कुल 1.4% नोटा में पड़े वोटो ने बाजी बिगाड़ी थी। गुजरात में वर्ष 2019 में 33% लोगों ने वोट ही नहीं दिया था। और अब तक 17 प्रतिशत लोग तीन बार नोटा का बदन दबा चुके हैं। वर्ष 2019 के चुनाव में गुजरात की 26 बैठकों में से छोटाउदेपुर बैठक पर सबसे अधिक 32,868 वोट नोटा को मिले थे। 2014 में वडोदरा से ही चुनाव लड़ रहे मोदी की उपस्थिति के बावजूद 18,053 वोट नोटा को मिले थे। मध्य गुजरात की पांच में से चार भरूच, छोटाउदेपुर, दाहोद और पंचमहाल जिले में नोटा का सबसे अधिक उपयोग किया गया है। इसका मतलब यह हुआ कि शहरी मतदाताओं के मुकाबले अधिक जागृत दिखे आदिवासी वोटर्स, नोटा का उपयोग करने में सबसे अधिक आगे रहे।