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Friday, April 4   11:44:33

लोगों के बीच बदल गई हॉरर की परिभाषा, परिवार संग पसंद कर रहे ये हॉरर-कॉमेडी फिल्में

समय के साथ दर्शकों की पसंद में जबरदस्त बदलाव आया है। जहां कभी हॉरर फिल्मों को सिर्फ डरावना या कामुक दृश्यों से भरपूर समझा जाता था, वहीं अब हॉरर-कॉमेडी फिल्मों को पारिवारिक मनोरंजन का दर्जा मिल चुका है।

हॉरर की परिभाषा बदली

90 के दशक में ‘वीराना’, ‘पुराना मंदिर’, ‘खूनी ड्रैकुला’, ‘बंद दरवाज़ा’ जैसी फिल्में सिंगल स्क्रीन थिएटरों में खास वर्ग को आकर्षित करती थीं। इन फिल्मों में अक्सर डर के साथ कामुकता को भी मिलाया जाता था – जैसे ड्रैकुला द्वारा नहाती हुई महिला पर हमला करने वाले सीन। ऐसे दृश्य परिवार के साथ देखना असंभव था।

लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। आज की हॉरर-कॉमेडी फिल्में हास्य और हल्के-फुल्के डर का बेहतरीन मिश्रण बन चुकी हैं, जिन्हें परिवार संग बैठकर देखा जा सकता है।

‘स्त्री’ से बदला ट्रेंड

बॉलीवुड में हॉरर और कॉमेडी दोनों की अलग-अलग अहमियत रही है, लेकिन जब दोनों को मिलाकर फिल्में बनने लगीं, तो दर्शकों ने इसे खूब सराहा।

अमर कौशिक की ‘स्त्री’ ने इस ट्रेंड की शुरुआत की। फिल्म ने 180 करोड़ से ज्यादा का बिज़नेस किया और इसके बाद ‘भूत’, ‘रूही’, ‘भेड़िया’, ‘भूलभुलैया 1 और 2’, ‘मुंज़या’, ‘स्त्री 2’ जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर छा गईं।

अमर कौशिक कहते हैं, “असली हॉरर वो होता है जिसमें डर के बाद आप खुद पर ही हँस पड़ें। यह डर और हँसी का कॉकटेल दर्शकों को बहुत पसंद आ रहा है।”

रामसे ब्रदर्स की हॉरर दुनिया

हॉरर फिल्मों की बात हो और रामसे ब्रदर्स का जिक्र न हो, ऐसा हो नहीं सकता। 70-80 के दशक में उनकी लो-बजट हॉरर फिल्में जैसे ‘वीराना’, ‘सामरी’, ‘दो गज ज़मीन के नीचे’ दर्शकों को खूब डराती थीं और कम बजट में भी भारी मुनाफा कमाती थीं।

हालांकि इन फिल्मों में अक्सर सस्ते VFX, नकली खून और उत्तेजक दृश्य होते थे, जिससे ये मुख्यधारा के दर्शकों और परिवारों से कट जाती थीं।

कंटेंट और स्टारकास्ट का नयापन

आज की हॉरर-कॉमेडी फिल्मों में कहानी, कास्टिंग और प्रोडक्शन क्वालिटी पर खास ध्यान दिया जाता है। श्रद्धा कपूर, कार्तिक आर्यन, विद्या बालन जैसे स्टार्स इन फिल्मों में नजर आ रहे हैं, जिससे ये बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंच रही हैं।

‘भूलभुलैया’ बनी गेम-चेंजर

निर्देशक अनीस बज़्मी का मानना है कि हॉरर को मुख्यधारा में लाने का असली श्रेय जाता है 2007 की ‘भूलभुलैया’ को। उन्होंने ‘भूलभुलैया 2’ को साफ-सुथरी हॉरर-कॉमेडी के रूप में पेश किया – डबल मीनिंग डायलॉग और सस्ते सेक्स सीन से दूर।

आज की हॉरर फिल्मों में जबरदस्त VFX, शानदार साउंड डिज़ाइन और AI तक का उपयोग होता है, जिससे ये तकनीकी रूप से भी दमदार बनती हैं।

हॉरर सिनेमा का इतिहास

हॉरर फिल्मों का इतिहास भारत में बहुत पुराना है:

  • ‘काला नाग’ (1924) – मूक फिल्मों का पहला हॉरर

  • ‘महल’ (1949) – मधुबाला की क्लासिक हॉरर

  • ‘मधुमती’ (1958), ‘कोहरा’ (1964), ‘गुमनाम’ (1965) – सस्पेंस और हॉरर का मिश्रण

  • ‘जानी दुश्मन’ – ग्रुप मर्डर और शादी के मंडप में दानव

एक समय था जब मुख्यधारा के अभिनेता भी इन फिल्मों का हिस्सा बनते थे, लेकिन रामसे युग के बाद वे इससे दूर हो गए।

राम गोपाल वर्मा और विक्रम भट्ट का योगदान

  • राम गोपाल वर्मा ने ‘रात’, ‘भूत’, ‘फૂંक’, ‘डरना मना है’, ‘डरना ज़रूरी है’ जैसी फिल्मों से नए तरह का मनोवैज्ञानिक हॉरर दिखाया।

  • विक्रम भट्ट ने ‘राज़’, ‘1920’, ‘हॉन्टेड 3D’, ‘घोस्ट’, ‘ब्लडी इश्क’ जैसी फिल्मों से हॉरर की अलग छाप छोड़ी।

एक समय था जब हॉरर फिल्में छुप-छुपाकर देखी जाती थीं, लेकिन आज वही हॉरर फिल्मों का बदला हुआ रूप दर्शकों को पूरे परिवार के साथ थिएटर तक खींच लाता है। डर और हँसी का यह नया मिश्रण आज के दौर की सबसे सफल सिनेमाई विधाओं में से एक बन चुका है।