स्वामी विवेकानंद के पूज्य गुरु दक्षिणेश्वर के ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस भारत के महान संत और विचारक थे। उन्होंने सभी धर्मों की एकता पर विशेष जोर दिया। बचपन से ही उनका विश्वास था कि ईश्वर का साक्षात्कार किया जा सकता है। इसी उद्देश्य से उन्होंने कठोर साधना और भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर दिया। रामकृष्ण परमहंस मानवता के उपासक थे और अपनी साधना के फलस्वरूप इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि संसार के सभी धर्म सत्य हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं है। धर्म केवल ईश्वर तक पहुंचने के अलग-अलग मार्ग हैं।
बचपन और प्रारंभिक जीवन
रामकृष्ण परमहंस का बचपन का नाम गदाधर था। उनकी बाल सुलभ सरलता और मंत्रमुग्ध कर देने वाली मुस्कान देखकर हर कोई आकर्षित हो जाता था।
सिर्फ सात वर्ष की उम्र में उनके सिर से पिता का साया उठ गया। इस कठिन परिस्थिति में उनके परिवार को आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। परंतु तमाम कठिनाइयों के बावजूद गदाधर का साहस और धैर्य अडिग बना रहा।
उनके बड़े भाई रामकुमार चटोपाध्याय कोलकाता में एक पाठशाला चलाते थे। वे गदाधर को अपने साथ कोलकाता ले गए। रामकृष्ण का अंतर्मन अत्यंत निर्मल, छल-कपट से रहित और विनम्र था। वे साम्प्रदायिक संकीर्णताओं से कोसों दूर थे और सदा अपने कार्यों में ही लीन रहते थे।
सभी धर्मों की एकता का संदेश
रामकृष्ण परमहंस ने अपने जीवन के अनुभवों से यह सिद्ध किया कि सभी धर्म समान हैं और सभी में ईश्वर की प्राप्ति संभव है। उन्होंने विभिन्न धार्मिक परंपराओं का पालन कर उनके गूढ़ रहस्यों को जाना और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सत्य एक ही है, बस लोग उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।
उनकी शिक्षाएं और विरासत
रामकृष्ण परमहंस का जीवन त्याग, भक्ति और साधना का प्रेरणास्रोत रहा है। उन्होंने अपने शिष्य स्वामी विवेकानंद को आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी, जिन्होंने आगे चलकर पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म का प्रचार किया।
उनकी जयंती पर हमें उनके विचारों को आत्मसात कर मानवता, प्रेम और भक्ति के मार्ग पर चलने का संकल्प लेना चाहिए।

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