वक्फ संशोधन बिल को लेकर देश का सियासी और सामाजिक माहौल एक बार फिर गरमा गया है। संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—से यह बिल पारित हो चुका है और अब इसे राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार है। लेकिन उससे पहले ही देशभर में इसके खिलाफ आवाजें बुलंद हो चुकी हैं। विपक्षी दलों के साथ-साथ मुस्लिम संगठनों ने इसे चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
शनिवार को आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान ने इस बिल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। इससे पहले शुक्रवार को कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद (किशनगंज, बिहार) और AIMIM प्रमुख व हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी भी कोर्ट पहुंचे थे। DMK ने भी याचिका दायर करने की बात कही है।
इस बीच, बिल का समर्थन करने वाले भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहनवाज हुसैन को जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। उन्हें फोन पर धमकी दी गई और सोशल मीडिया पर भी लगातार उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। यह लोकतंत्र में विचारों के आदान-प्रदान की जगह हिंसा और धमकी के बढ़ते चलन को दर्शाता है, जो बेहद चिंताजनक है।
जुमे की नमाज के बाद देशभर में प्रदर्शन
शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद देश के कई राज्यों—पश्चिम बंगाल, गुजरात, बिहार, झारखंड, तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक और असम—में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने वक्फ संशोधन बिल के विरोध में सड़कों पर प्रदर्शन किया। इन प्रदर्शनों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हुए। शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन इसे राजनीतिक हथियार या धार्मिक ध्रुवीकरण का जरिया बनाना गंभीर चिंता का विषय है।
बिल पर संसद में हुई थी लंबी बहस
इस विधेयक पर 2 और 3 अप्रैल को लोकसभा और राज्यसभा में लंबी—करीब 12-12 घंटे—बहस हुई, जिसके बाद इसे पास किया गया। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने बिल पास होने के बाद ऐलान किया था कि कांग्रेस इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएगी।
वक्फ संशोधन बिल को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है, वह भारत की संवैधानिक व्यवस्था और अल्पसंख्यकों की भावनाओं के बीच संतुलन बनाने की एक गंभीर चुनौती बन गया है। एक तरफ सरकार इसे पारदर्शिता और वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग पर लगाम लगाने की दिशा में एक कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय को इसमें अपने धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप नजर आ रहा है।
इस मुद्दे पर जरूरी है कि सरकार और समाज दोनों ही संयम और संवाद का रास्ता अपनाएं। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में जो भी निर्णय देगा, उसे सभी पक्षों को सम्मानपूर्वक स्वीकार करना चाहिए। लोकतंत्र में विरोध जायज है, लेकिन धमकियां और हिंसा कतई नहीं।

More Stories
वडोदरा के रक्षित चौरसिया कांड मामले बड़ा खुलासा…..
डॉ. एम. शारदा मेनन: भारत की पहली महिला मनोचिकित्सक, जिन्होंने संवारी लाखों की जिंदगी
हल्दी के रंग में रंगा महाराष्ट्र, भक्ति की बौछार