रामनवमी, जो सनातन संस्कृति में शक्ति और भक्ति का प्रतीक है, इस बार पश्चिम बंगाल में सियासी गर्मी भी साथ लाई। राज्य में भाजपा (BJP) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है।
क्या है पूरा मामला?
रामनवमी के मौके पर बीजेपी ने दावा किया कि इस बार राज्य की सड़कों पर एक करोड़ से अधिक हिंदू भक्त उतरेंगे। यह बयान राजनीति में हलचल मचाने के लिए काफी था। वहीं, टीएमसी ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह महज सांप्रदायिक तनाव भड़काने की साजिश है। पार्टी ने आरोप लगाया कि बीजेपी रामनवमी जैसे धार्मिक आयोजन को राजनीति का अखाड़ा बना रही है।
सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन या सियासी रणनीति?
बीजेपी का कहना है कि बंगाल में हिंदू समुदाय को अपने धार्मिक आयोजनों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। पार्टी के नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा, “हम अपने धर्म के प्रति जागरूक हैं और हमें किसी से प्रमाणपत्र लेने की जरूरत नहीं।” बीजेपी इसे हिंदू अस्मिता से जोड़कर देख रही है और इसे ‘शक्ति प्रदर्शन’ का नाम दे रही है। दूसरी ओर, टीएमसी सरकार इसे कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बता रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, “कुछ लोग धार्मिक आयोजनों के नाम पर बंगाल का माहौल खराब करना चाहते हैं, लेकिन हम किसी भी हाल में शांति भंग नहीं होने देंगे।”
राजनीतिक लड़ाई या जनता की भावनाएँ? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा सिर्फ रामनवमी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे 2024 के लोकसभा चुनावों की रणनीति भी काम कर रही है। बंगाल में बीजेपी लगातार हिंदू वोटबैंक को मजबूत करने की कोशिश में है, जबकि टीएमसी खुद को सभी वर्गों की पार्टी के रूप में पेश कर रही है।
आगे क्या होगा? रामनवमी का यह मुद्दा अभी ठंडा पड़ता नहीं दिख रहा। सवाल यह है कि यह धार्मिक आयोजन शांति और श्रद्धा का प्रतीक बना रहेगा या सियासी दांव-पेच का अखाड़ा बन जाएगा? बंगाल की सड़कों पर यह टकराव धार्मिक आस्था के लिए है या राजनीतिक भविष्य के लिए यह देखने वाली बात होगी।

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