यह दुखद घटना उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में हुई, जहां 36 वर्षीय प्रियंसा सोनी ने मासिक धर्म के कारण नवरात्रि पूजा न कर पाने से व्यथित होकर आत्महत्या कर ली क्या मासिक धर्म इतना बड़ा अपराध है ?की किसी को अपनी जान देनी पड़े क्या आस्था के नाम पर महिलाओं को मानसिक रूप से इतना तोड़ा जा सकता है कि वे जीवन को ही त्याग दें? यह सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि समाज की जड़ें हिलाने वाला सच है। आइए, इस दर्दनाक घटना के पीछे की परतों को खोलने की कोशिश करते हैं।
शुरुआत: एक मासूम विश्वास या डर का जाल?
घटना सिर्फ इतनी नहीं कि एक महिला ने आत्महत्या कर ली। असली सवाल यह है कि उसने ऐसा क्यों किया? जानकारी के मुताबिक, महिला ने नवरात्रि के दौरान मासिक धर्म आने के कारण खुद को अपवित्र महसूस किया। लेकिन यह भावना अचानक नहीं आई थी—बल्कि यह बरसों से समाज और परिवार द्वारा उसके भीतर डाली गई थी।
उसने सुना होगा—”पीरियड्स में मंदिर मत जाना,” “देवी माँ नाराज हो जाएँगी,” “पवित्रता बनी रहनी चाहिए।”
इन बातों को सुनते-सुनते उसने यह मान लिया कि अगर वह पूजा के समय मासिक धर्म में है, तो वह देवी की भक्त बनने के लायक नहीं रही। और यही सोच उसे इस हद तक ले गई कि उसने अपनी जान दे दी।
सवाल उठता है: क्या देवी माँ ने यह कहा था? हम देवी माँ को शक्ति, सृजन और मातृत्व का प्रतीक मानते हैं। लेकिन जब वही देवी माँ अपने शरीर के एक स्वाभाविक चक्र से गुजरती महिलाओं को ‘अपवित्र’ घोषित कर दी जाती हैं, तो यह आस्था से ज्यादा अंधविश्वास लगता है।
क्या कभी किसी वेद, पुराण, या धार्मिक ग्रंथ में यह लिखा गया है कि भगवान को स्त्रियों के मासिक धर्म से समस्या है? या फिर यह समाज द्वारा गढ़ी गई एक नई साजिश है, जो महिलाओं को नियंत्रित करने का एक और तरीका है?
मासिक धर्म से डर क्यों? मासिक धर्म न सिर्फ एक जैविक प्रक्रिया है, बल्कि यह स्त्री के मातृत्व और सृजन की क्षमता का प्रमाण भी है। तो फिर यह डर कहाँ से आता है? इसका जवाब हमें इतिहास में मिलता है।
पहले के समय में जब सैनिटरी सुविधाएँ नहीं थीं, तब शायद स्वच्छता और स्वास्थ्य कारणों से महिलाओं को पूजा स्थलों से दूर रहने को कहा जाता था। लेकिन धीरे-धीरे यह नियम धर्म और पवित्रता से जोड़ दिया गया। और अब, यह डर इतना बढ़ गया है कि एक महिला ने आत्महत्या कर ली!
कौन जिम्मेदार है?
परिवार जिसने शायद उसे कभी यह नहीं सिखाया कि मासिक धर्म कोई पाप नहीं है।
समाज जिसने उसे अपराधबोध और शर्म का बोझ दे दिया।
धर्मगुरु जिन्होंने इस अवधारणा को सुधारने के बजाय इसे और गहराई तक धकेला।
हम सब जो इस परंपरा को बिना सवाल किए मानते आ रहे हैं।
आगे क्या?
इस घटना ने हमें आईना दिखाया है। हमें सोचने पर मजबूर किया है कि क्या हमारा धर्म महिलाओं का सम्मान करता है या सिर्फ उन्हें नियमों और वर्जनाओं में बाँधता है?
अब समय आ गया है कि हम अपनी सोच बदलें। हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को यह सिखाना होगा कि देवी माँ सिर्फ उनके मंदिर में जलाए गए दीयों से खुश नहीं होतीं, बल्कि उस सोच से खुश होती हैं जो नारी को सशक्त बनाती है।
अगर इस एक आत्महत्या से हम सीख सकते हैं, तो यह बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। लेकिन अगर हम चुप रहे, तो कौन जाने, अगली बार यह खबर किसी और लड़की की जिंदगी लील लेगी।
अब सवाल आपसे—क्या आप इस सोच को बदलने का हिस्सा बनेंगे?

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