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Guru Govind Singh: सिखों के 10 वें गुरु क्या सिखाते हैं हमें!

17 जनवरी 2024 को गुरु गोविन्द सिंह की जयंती मनाई जा रही है। गुरु गोविन्द सिंह सिखों के 10 वें और आखरी गुरु थे। इतिहासकारों के अनुसार उनके पिताजी का नाम तेज बहादुर था। कहा जाता है कि महज 10 साल की उम्र में ही वह सिखों के गुरु बन गए थे। वह एक योद्धा, कवि और दार्शनिक थे। सिखों को उनके द्वारा मिला हुआ सबसे बड़ा योगदान है “खलसा पंथ की स्थापना”। साथ ही सिखों को पंच ककार धारण करने के लिए उन्होंने ही कहा था।

गोविन्द सिंह का पूरा जीवन प्रेरणादायी रहा है। गुरु गोविन्द सिंह बचपन से ही आध्यात्मिक और निडर रहे हैं। कश्मीरी पंडितों का ज़बरदस्ती जब धर्म परिवर्तन हो रहा था तो वहां की प्रजा गोविन्द सिंह के पिता तेज बहादुर के पास आई और उनसे कहा कि अगर कोई निडर महापुरुष आके उन इस्लामियों से लड़े और इस्लाम स्वीकार न करे तो ही वह बच सकते हैं। कृपया हमारी मदद करें। तब गोविन्द सिंह ने अपने पिता कि ओर दृष्टि करते हुए बोला कि आपके सिवा और कोई महापुरुष कौन हो सकता है। औरंगजेब की सभा में जाकर उसे चेतावनी दीजिए और कहिए की धर्म परिवर्तन करना छोड़ दें। यदि वह न माने तो अपना जीवन कुर्बान कीजिए। बेटे की यह बात सुनके तेज बहादुर इस्लामियों से लड़े और वीरगति को प्राप्त हो गए। बैसाखी के दिन, 10 साल की उम्र में उन्हें सिखों के 10 वें गुरु घोषित कर दिया गया।

इस प्रकार अपनी बहादुरी और निडरता का कई बार प्रदर्शन करके उन्होंने अपने आप को सबके दिलों में अमर रखा। उनके इस प्रसंग से और उनके पूरे जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि हमें निडर, आध्यात्मिक, सच्चाई से भरपूर और सेवा देने के लिए हमेशा तैयार होना चाहिए।

गुरु गोविन्द सिंह की कुछ रचनाएं

गुरु गोविन्द सिंह केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि एक साहित्यकार, भक्त और आध्यात्मिक नेता भी थे। उनकी कुछ रचनाएं हैं “जाप साहिब”, “बचित्तर नाटक”, “चंडी चरित्र”, “चौबीस अवतार”, और अन्य। उनके कहे हुए कुछ बोल हमारे जीवन को एक मार्गदर्शन दे सकते हैं। उनकी कुछ कही हुई बातों से इस गुरु गोविन्द सिंह जयंती का जश्न मनाते हैं और प्रेरणा लेते हैं।

 “सवा लाख से एक लड़ाऊं, चिड़ियन ते मैं बाज तुड़ाऊं,

तबै गुरु गोबिंद सिंह नाम कहाऊं!!”

“मैं उन लोगों को पसंद करता हूँ जो सच्चाई के मार्ग पर चलते हैं”।