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M Karunanidhi

एक ऐसा CM जिसके निधन पर मचा हाहाकार, राजनीति में दुश्मनी में तब्दील हुई दोस्ती की कहानी

भारत वासियों ने जहां नेता, अभिनेताओं को लताड़ा है तो, उनको इस हद तक चाहता है कि,उनके पीछे अपनी जानें भी न्योछावर की है। देश का एक ऐसा CM जिसकी चाहत में उनके निधन की खबर पर अपनी जाने कुर्बान कर दी।

स्वतंत्रता के संघर्ष के वक्त देश के नेताओं के आवाहन पर लोग अपना घरबार छोड़कर निकल पड़े। अंग्रेजों के लाठीचार्ज, उनकी प्रताड़ना को झेलते हुए अपनी जानें कुर्बान कर दी। ये कहानी है एक ऐसे CM की जिनकी दोस्ती और दुश्मनी की मिसालें दी गई, वही उनके निधन पर राज्य में हाहाकार मच गया था, और उनकी मौत के समाचार को स्वीकार नहीं कर पाए फैंस ने उनके पीछे जानें कुर्बान कर दी।

जी हां….हम बात कर रहे है, तमिलनाडु के पूर्व सी एम एम.जी.रामचंद्रन की। शुरुआत करते है, उनकी एम करुणानिधि की गहरी दोस्ती और कड़वाहट से भारी दुश्मनी की। राजनीति में आज भी इन दोनों की दोस्ती और दुश्मनी की मिसालें दी जाती हैं। जब दो दोस्त दुश्मन होते है तो शुरू हो जाती है, एक दूसरे को पछाड़ने की होड।

17 जनवरी श्रीलंका में जन्मे MGR के नाम से प्रसिद्ध हुए मरुदुर गोपाल रामचंद्रन ने दक्षिण भारत के फिल्म उद्योग में दबदबा कायम किया। इस वक्त एमजी रामाचंद्रन और एम करुणानिधि बहुत ही पक्के दोस्त थे। एक लेखक, दूसरा अभिनेता। इन दोनों की जोड़ी बहुत मशहूर हुई।इस जोड़ी ने कई सुपरहिट फिल्में दी। 1952 में ब्राह्मणवाद पर बनी फिल्म “पराशक्ति” विवादों में घिरी। इसका विरोध भी उठा, लेकिन इस फिल्म की कथा से DMK के स्थापक अन्नादुरई की सोच मिलती थी। इसका करुणानिधि को राजनैतिक फायदा हुआ। करुणानिधि DMK से जुड़ गए, और गरीबों के मसीहा बनकर उभरे MGR ने थामा कांग्रेस का दामन।

ये साथ कुछ समय का रहा। दोस्त की पुकार पर वे DMK से जुड़ गए। 1969 में DMK सत्ता में आई,और अन्नादुरई सीएम बने। उनके महज 18 महीनों में निधन के बाद सीएम का पद करुणानिधि ने संभाला। यहां उल्लेखनीय है कि MGR के DMK में जुड़ने से उनके बहुत सारे समर्थक भी इस पार्टी के समर्थन में आगे आए।

वक्त के साथ दो दोस्तों के बीच पड़ी दरार ने दुश्मनी का रूप ले लिया। MGR ने DMK छोड़कर ऑल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कढ़गम नामक नई पार्टी बनाई, और इस पार्टी के झंडे तले उन्होंने 1972 में पूरे दबदबे के साथ जीत हासिल की।करुणानिधि हाशिए में चले गए। 1972 से 24 दिसंबर 1987 को उनकी मृत्यु तक एमजी रामचंद्रन मुख्यमंत्री पद पर बने रहे।

एम जी रामचंद्रन का तमिलनाडु में बहुत ही ऊंचा कद हो गया था। दिल्ली सरकार में भी उनका दबदबा रहा। उनकी मृत्यु की खबर सुनते ही जैसे समग्र तमिलनाडु शोक में डूब गया।एक अभिनेता और नेता के रूप में उनके इतने अधिक प्रशंसक थे कि वे उनकी मृत्यु की बात को स्वीकार नहीं कर पाए, और उनके प्रति गहरी लगाव के चलते कई लोगों ने आत्मदाह किया,कईयों ने जहर खाया, तो कई ने अपनी नसें काट ली, और मौत को कुबूल कर लिया।तमिलनाडु में उनके निधन पर जैसे भूचाल आ गया था, लोगो में हाहाकार मच गया था। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार उस समय करीब 30 से अधिक लोगों ने उनके प्यार में अपने आप को कुर्बान कर दिया था।

तो ये थी दो दोस्तों की गहरी दोस्ती और बाद में हुई दुश्मनी की दास्तान,और एक ऐसे नेता,अभिनेता की कहानी जिसकी मौत को स्वीकार न कर पाने वाले चाहकों की मौत की कहानी।