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डॉ. एम. शारदा मेनन: भारत की पहली महिला मनोचिकित्सक, जिन्होंने संवारी लाखों की जिंदगी 

“मन के हारे हार है, मन के जीते जीत…”
यह कहावत डॉ. एम. शारदा मेनन के जीवन पर पूरी तरह लागू होती है। एक महिला, जिसने न सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य की दुनिया में क्रांति लाई, बल्कि उन टूटे हुए दिलों और भटके हुए दिमागों को भी संवारने का काम किया, जिन्हें समाज ने कभी समझने की कोशिश नहीं की।

एक साधारण लड़की से भारत की पहली महिला मनोचिकित्सक बनने तक

5 अप्रैल 1923 को चेन्नई में जन्मी शारदा मेनन एक साधारण परिवार से थीं, लेकिन उनके सपने साधारण नहीं थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा चेन्नई से प्राप्त की और फिर MBBS की डिग्री हासिल कर 1951 में मनोचिकित्सा (Psychiatry) में विशेषज्ञता प्राप्त की। यह एक ऐसा समय था जब भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बहुत कम जागरूकता थी। मानसिक रोगियों को समाज से अलग-थलग कर दिया जाता था, उन्हें ‘पागल’ समझा जाता था और अस्पतालों में अमानवीय व्यवहार सहना पड़ता था।

“जहाँ दुनिया ने त्याग दिया, वहाँ उन्होंने अपनाया” डॉ. शारदा मेनन ने इन पीड़ितों की तकलीफ को महसूस किया। उन्होंने जाना कि मानसिक बीमारी कोई अभिशाप नहीं, बल्कि एक ऐसी समस्या है जिसका इलाज संभव है, बशर्ते मरीज को सही देखभाल और सम्मान दिया जाए। उनके लिए हर मरीज सिर्फ एक केस स्टडी नहीं, बल्कि एक कहानी थी—एक अधूरी कहानी जिसे वो पूरा करना चाहती थीं।

“कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन्हें दुनिया समझ नहीं पाती,
पर कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो दर्द को अपना मकसद बना लेते हैं…”

SCARF: एक नई रोशनी 1984 में उन्होंने “स्किजोफ्रेनिया रिसर्च फाउंडेशन (SCARF)” की स्थापना की, जो भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ। इस संस्था ने न केवल रोगियों का इलाज किया, बल्कि उनके पुनर्वास (Rehabilitation) पर भी ध्यान दिया। उन्होंने मरीजों को समाज में सम्मानजनक जीवन देने के लिए कई प्रोग्राम शुरू किए, जिससे मानसिक रोगियों को भी नौकरी और आत्मनिर्भरता का मौका मिला।

पुरस्कार नहीं, लोगों के चेहरे की मुस्कान थी उनकी असली जीत
उनकी सेवा और योगदान को देखकर भारत सरकार ने उन्हें “पद्मभूषण” से सम्मानित किया, लेकिन उनके लिए असली इनाम वह मुस्कान थी, जो उनके मरीजों के चेहरे पर आती थी। वह कहती थीं

“दवा से ज्यादा जरूरी है देखभाल,
इलाज से ज्यादा जरूरी है अपनापन।”

एक युग का अंत, लेकिन एक विचारधारा की अमरता
5 दिसंबर 2021 को, जब वह 98 वर्ष की उम्र में इस दुनिया से चली गईं, तो पीछे छोड़ गईं एक ऐसी विरासत जो आने वाले समय में भी लोगों को राह दिखाती रहेगी। उनके द्वारा बनाए गए संस्थान, उनके विचार और उनकी प्रेरणा हमेशा जीवित रहेंगे।

डॉ. एम. शारदा मेनन की सीख एक प्रेरणा

उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि
कोई भी समस्या इतनी बड़ी नहीं होती कि उसका समाधान न हो।
सच्ची सेवा वही है, जो किसी की जिंदगी बदल दे।
मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना और इसे सामान्य मानना ही सही दिशा में पहला कदम है।

“जो दर्द को समझता है, वही सच्चा इलाज कर सकता है…”
डॉ. शारदा मेनन ने न केवल मानसिक रोगियों का इलाज किया, बल्कि उनके टूटे हुए विश्वास को भी जोड़ा। उनके योगदान को शब्दों में सीमित नहीं किया जा सकता, लेकिन उनकी जिंदगी हमें हमेशा यह प्रेरणा देगी कि एक इंसान, अगर ठान ले, तो वह हजारों जिंदगियों को रोशनी दे सकता है।