सान्या मल्होत्रा इन दिनों चर्चा में हैं। उनकी “मिसेज” नाम की स्टेट-टू-ओटीटी फिल्म को लेकर सोशल मीडिया पर काफी बहस हो रही है। इस पर गंभीर चर्चाओं से लेकर मज़ेदार मीम्स तक बन रहे हैं। यह फिल्म 2021 में आई मलयालम फिल्म “द ग्रेट इंडियन किचन” की आधिकारिक हिंदी रीमेक है।
यह कहानी एक ऐसी युवा महिला की है, जो मध्यमवर्गीय परिवार में शादी करके आती है और उम्मीद करती है कि उसे अपने पति और ससुरालवालों से प्यार, सम्मान और सहयोग मिलेगा। वह घर की मुफ्त नौकरानी नहीं, बल्कि खुद के सपने देखने और उन्हें पूरा करने की इच्छा रखने वाली एक स्वतंत्र शख्सियत है। लेकिन जब उसे यह सब नहीं मिलता, तो वह अंदर ही अंदर घुटने लगती है, और फिर एक दिन उसका गुस्सा फूट पड़ता है।
सान्या मल्होत्रा का नज़रिया
सान्या कहती हैं, “मुझे मूल फिल्म बहुत पसंद आई थी। मैंने अपने आसपास कई ऐसी महिलाओं को देखा है, जिनकी ज़िंदगी इस फिल्म की कहानी से मिलती-जुलती है। ‘मिसेज’ भारत की लाखों महिलाओं की हकीकत को दर्शाती है। एक अभिनेत्री के तौर पर मैं हमेशा ऐसी कहानियों की तलाश में रहती हूं, जो सिर्फ मुझे ही नहीं, बल्कि दर्शकों को भी सशक्त महसूस कराएं। ‘मिसेज’ को चुनने के पीछे यही वजह थी।”
महिला-केंद्रित फिल्मों से बनाई अपनी अलग पहचान
सालों में सान्या ने सोच-समझकर महिला-केंद्रित और विचारोत्तेजक फिल्में चुनी हैं। वे कहती हैं, “यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि मेरी सोची-समझी पसंद है। मेरी फिल्मों के चुनाव की वजह से मेरी पहचान एक नारीवादी अभिनेत्री के रूप में बन गई है, जिसे मैं कभी छुपाना नहीं चाहती। बॉलीवुड में अक्सर नायिकाओं की नारीवादी छवि को बढ़ावा नहीं दिया जाता, ताकि पुरुष कलाकार असहज महसूस न करें। लेकिन मैंने ‘पगलैट’ (2021) और ‘कटहल’ (2023) जैसी फिल्में की हैं। भले ही ये छोटे कदम हों, लेकिन बदलाव की शुरुआत कहीं न कहीं से करनी ही पड़ती है।”
आरती कड़वे द्वारा निर्देशित “मिसेज” को उसकी मूल मलयालम फिल्म जितनी धारदार नहीं माना गया, लेकिन अगर तुलना किए बिना देखें, तो यह निश्चित रूप से एक गहरी छाप छोड़ती है। फिल्म सवाल उठाती है—क्या महिलाओं की पहचान सिर्फ किचन की चार दीवारों तक सीमित है? क्या वे अपनी आकांक्षाओं को आकार देकर एक नई पहचान बना सकती हैं?
सान्या का किरदार: संघर्ष और आत्मनिर्णय की कहानी
सान्या बताती हैं, “जब मैंने ‘मिसेज’ की स्क्रिप्ट पढ़ी, तो मैं इस ताकतवर कहानी को पर्दे पर जीवंत करने के लिए पूरी तरह से तैयार हो गई थी। मेरे किरदार की जर्नी एक शांत लेकिन दृढ़ संघर्ष की है। यह महिला बर्तन साफ़ करते हुए अपने सपनों को फिर से जीने का फैसला करती है। अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी से निकलकर खुद की पहचान बनाने के लिए संघर्ष करती है। इस किरदार को निभाना मेरे लिए एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन मैंने इसे करने का पूरा आनंद लिया।”
फिल्म की आलोचना और दर्शकों की प्रतिक्रिया
“मिसेज” को लेकर कुछ आलोचनाएं भी सामने आई हैं। कुछ दर्शकों का कहना है कि फिल्म की नायिका ने अपनी भावनाओं को खुलकर क्यों नहीं रखा? उसने अपने दर्द और असंतोष को अंदर ही अंदर क्यों जमा रहने दिया? उसका पति और ससुराल वाले बुरे लोग नहीं थे, अगर वह खुलकर अपनी बात कहती, तो शायद वे समझ जाते। इसके बजाय, वह सब कुछ सहती रही और फिर अचानक सब तोड़-फोड़कर रिश्तों को खत्म करके चली जाती है।
हालांकि, इस बहस को फिल्म की सफलता माना जा सकता है। आखिरकार, कोई भी फिल्म जो समाज में संवाद शुरू कर सके, वही असली मायनों में प्रभावी होती है।

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