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वक्फ संशोधन बिल पर संग्राम: संपत्ति की सुरक्षा या मुस्लिमों के हक पर वार?

नई दिल्ली | लोकसभा में बुधवार को अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने वक्फ संशोधन बिल 2024 पेश किया, जिस पर करीब आठ घंटे तक तीखी बहस हुई। सरकार ने इसे वक्फ बोर्ड की संपत्तियों को कानूनी दायरे में लाने और उनके दुरुपयोग को रोकने वाला कदम बताया, जबकि विपक्ष ने इसे मुस्लिम विरोधी बताते हुए तीखी आपत्ति जताई।

सरकार का पक्ष: कांग्रेस पर चुनावी फायदा लेने का आरोप

बिल पेश करते हुए किरेन रिजिजू ने कहा कि 2014 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार ने 123 प्राइम प्रॉपर्टी दिल्ली वक्फ बोर्ड को ट्रांसफर कर दी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि यह फैसला अल्पसंख्यक वोटों को साधने के लिए लिया गया था, लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस चुनाव हार गई।

रिजिजू ने आगे कहा, “अगर आज यह संशोधन नहीं किया जाता, तो संसद भवन समेत कई महत्वपूर्ण इमारतों पर वक्फ संपत्ति होने का दावा किया जा सकता था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने आते ही इस पर रोक लगाने का फैसला लिया, ताकि देश की संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।”

अखिलेश यादव का विरोध: ‘मुसलमानों से घर-दुकान छीनने की साजिश’

समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता अखिलेश यादव ने इस बिल का कड़ा विरोध किया। उन्होंने इसे मुस्लिम विरोधी करार देते हुए कहा कि यह मुसलमानों से उनकी संपत्तियां छीनने की सोची-समझी साजिश है।

TMC और AIMPLB की कड़ी प्रतिक्रिया

टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने भी बिल का विरोध किया। उन्होंने कहा, “वक्फ प्रॉपर्टी मुस्लिम समुदाय की बैकबोन है। यह पूरी तरह धार्मिक संस्था है और इसे सरकार की दखलंदाजी से बचाने की जरूरत है।”

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने भी इस बिल पर आपत्ति जताई। AIMPLB के प्रवक्ता डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा, “अगर यह बिल संसद में पास होता है, तो हम देशभर में विरोध प्रदर्शन करेंगे। यह संशोधन पूरी तरह भेदभावपूर्ण और सांप्रदायिक रूप से प्रेरित है। हम कानूनी और संवैधानिक तरीके से इसका विरोध करेंगे।”

सरकार के पास बहुमत, पास होने की संभावना

विपक्ष के विरोध के बावजूद सरकार के पास बहुमत है और वोटिंग में यह बिल पारित होने की संभावना है। NDA गठबंधन के सांसदों की संख्या इस बिल को पारित कराने के लिए पर्याप्त है।

 संपत्तियों की सुरक्षा जरूरी, लेकिन धार्मिक भावनाओं का भी रखें ध्यान

इस पूरे विवाद में दोनों पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें हैं। सरकार का कहना है कि देश की संपत्तियों की सुरक्षा जरूरी है, वहीं विपक्ष और मुस्लिम संगठनों को डर है कि इससे धार्मिक संस्थानों की स्वतंत्रता प्रभावित होगी।

सरकार को चाहिए कि वह संशोधन की जरूरत और इसके प्रभाव को विस्तार से समझाए। विपक्ष को भी इस मुद्दे को सिर्फ धार्मिक रंग देने की बजाय कानूनी और प्रशासनिक नजरिए से देखना चाहिए। सही समाधान संवाद और संतुलन में ही छिपा है, न कि राजनीतिक विवाद में।